रुद्रादित्या वसवो ये च साध्याविश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च ।गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घावीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे ॥
rudrādityā vasavo ye ca sādhyāviśve'śvinau marutaścoṣmapāśca |gandharvayakṣāsurasiddhasaṅghāvīkṣante tvāṃ vismitāścaiva sarve ||
रुद्र, आदित्य, वसु और साध्य, विश्वेदेव, दोनों अश्विनीकुमार, मरुद्गण और ऊष्मप, गन्धर्वों, यक्षों, असुरों और सिद्धों के समूह, ये सब के सब विस्मित होकर आपको देख रहे हैं।
व्याख्या
अर्जुन कृष्ण द्वारा दिखाए गए विश्वरूप का वर्णन कर रहे हैं। वे रुद्र, आदित्य, मरुत् जैसे देव-वर्गों और अन्य दिव्य प्राणियों की गिनती करके कहते हैं कि वे सब भी इस रूप को चकित होकर देखते हैं। 'ऊष्मप' का अर्थ सामान्यतः पितर माना जाता है, जो हविष्य की भाप ग्रहण करने वाले कहे गए हैं।