वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्तिदंष्ट्राकरालानि भयानकानि ।केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषुसंदृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः ॥
vaktrāṇi te tvaramāṇā viśantidaṃṣṭrākarālāni bhayānakāni |kecidvilagnā daśanāntareṣusaṃdṛśyante cūrṇitairuttamāṅgaiḥ ||
वे बड़ी तेज़ी से आपके उन भयंकर मुखों में समा रहे हैं, जो विकराल दाढ़ों के कारण डरावने लगते हैं। कुछ योद्धा दाँतों के बीच फँसे दिखाई दे रहे हैं, और उनके सिर चूर-चूर हो चुके हैं।
व्याख्या
विश्वरूप को देखकर अर्जुन भयभीत होकर कृष्ण से कह रहे हैं। पिछले श्लोक में उन्होंने धृतराष्ट्र के पुत्रों, भीष्म, द्रोण, कर्ण और अपने पक्ष के योद्धाओं का नाम लिया था। यह श्लोक उसी वाक्य को पूरा करता है, और बताता है कि वे सब उस रूप के मुखों में प्रवेश कर रहे हैं। यह दृश्य युद्ध में होने वाले विनाश और काल की शक्ति का प्रतीक है।