पश्यामि देवांस्तव देव देहेसर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्घान् ।ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थमृषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान् ॥
paśyāmi devāṃstava deva dehesarvāṃstathā bhūtaviśeṣasaṅghān |brahmāṇamīśaṃ kamalāsanasthamṛṣīṃśca sarvānuragāṃśca divyān ||
हे देव, मैं आपके शरीर में सभी देवताओं को देखता हूँ, और वैसे ही प्राणियों के अनेक प्रकार के समूहों को भी; कमल के आसन पर बैठे स्वामी ब्रह्मा को, सभी ऋषियों को और दिव्य नागों को।
व्याख्या
अर्जुन को कृष्ण की कृपा से दिव्य दृष्टि मिली है, और वह विस्मय से भरकर उनका विश्वरूप देख रहा है। वह कहता है कि उसे इस एक ही शरीर में देवता, सब जीवों के समूह, सृष्टिकर्ता ब्रह्मा, ऋषि और दिव्य सर्प दिखाई दे रहे हैं, यानी पूरा ब्रह्मांड एक जगह समाया है। "ईश" शब्द को कुछ व्याख्याकार ब्रह्मा का ही विशेषण मानकर "स्वामी ब्रह्मा" पढ़ते हैं, जबकि कुछ उसे शिव का नाम मानकर ब्रह्मा और शिव दोनों को देखना समझते हैं।