भक्त्या त्वनन्यया शक्यमहमेवंविधोऽर्जुन ।ज्ञातुं दृष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परंतप ॥
bhaktyā tvananyayā śakyamahamevaṃvidho'rjuna |jñātuṃ dṛṣṭuṃ ca tattvena praveṣṭuṃ ca paraṃtapa ||
परन्तु हे अर्जुन, अनन्य भक्ति से ही मुझे इस रूप में जाना जा सकता है, यथार्थ रूप में देखा जा सकता है और मुझमें प्रवेश किया जा सकता है, हे परंतप।
व्याख्या
कृष्ण ने अभी कहा कि वेद, तप, दान और यज्ञ से वह दर्शन नहीं मिल सकता जो अर्जुन को मिला। यहाँ वे एकमात्र उपाय बताते हैं: अनन्य भक्ति, यानी केवल उन्हीं की ओर लगा हुआ प्रेम। इससे तीन फल मिलते हैं: उन्हें जानना, उन्हें तत्त्व से यानी वे वास्तव में जैसे हैं वैसा देखना, और उनमें प्रवेश करना। 'प्रवेश' को अद्वैत परम्परा परमात्मा में लीन होना मानती है, जबकि भक्ति-परम्पराएँ इसे भेद बनाए रखते हुए ईश्वर से प्रेमपूर्ण मिलन मानती हैं।