ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः ।प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत ॥
tataḥ sa vismayāviṣṭo hṛṣṭaromā dhanañjayaḥ |praṇamya śirasā devaṃ kṛtāñjalirabhāṣata ||
तब विस्मय से भरे हुए और रोमांचित हुए धनञ्जय ने सिर झुकाकर देव को प्रणाम किया और हाथ जोड़कर बोलना आरम्भ किया।
व्याख्या
संजय धृतराष्ट्र को बता रहे हैं कि कृष्ण के शरीर में अनेक रूपों में बँटा सारा जगत् देखकर अर्जुन (धनञ्जय, यानी "धन को जीतने वाला") ने क्या किया। वे आश्चर्य से भर जाते हैं और उनके रोंगटे खड़े हो जाते हैं। वे श्रद्धा से प्रणाम करते हैं और हाथ जोड़ते हैं, और अगले श्लोक में उनकी स्तुति के शब्द आते हैं।