न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानैर्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः ।एवंरूपः शक्य अहं नृलोकेद्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर ॥
na vedayajñādhyayanairna dānairna ca kriyābhirna tapobhirugraiḥ |evaṃrūpaḥ śakya ahaṃ nṛlokedraṣṭuṃ tvadanyena kurupravīra ||
हे कुरुवीर! मनुष्यलोक में तुम्हारे अतिरिक्त और कोई मुझे इस रूप में न वेदों के अध्ययन से, न यज्ञों से, न दान से, न कर्मकांड से और न उग्र तपस्याओं से देख सकता है।
व्याख्या
कृष्ण ने अभी अर्जुन को अपना विश्वरूप दिखाया है और अब बताते हैं कि यह दर्शन कितना दुर्लभ है। वेदाध्ययन, यज्ञ, दान, कर्मकांड या तप, इनमें से कोई भी अकेला इसे पाने का साधन नहीं है। अनेक टीकाकार मानते हैं कि यह दर्शन कृष्ण की कृपा से और भक्ति से मिलता है, जैसा आगे के श्लोकों में संकेत है; पर इस श्लोक में केवल इतना कहा गया है कि ये बाहरी साधन पर्याप्त नहीं हैं।