आप ही जानने योग्य परम अक्षर हैं। आप ही इस विश्व के सर्वोच्च आधार हैं। आप अविनाशी हैं और शाश्वत धर्म के रक्षक हैं। मेरी समझ में आप ही सनातन पुरुष हैं।
व्याख्या
विश्वरूप के दर्शन से विस्मित अर्जुन यहाँ कृष्ण की स्तुति करते हुए उन्हें परम सत्य के रूप में पहचानते हैं। "अक्षर" का अर्थ है जो कभी नष्ट नहीं होता, और "निधान" का अर्थ है वह आधार जिसमें सब कुछ टिका है। "धर्म" यहाँ वह शाश्वत व्यवस्था है जो जगत को धारण करती है, और "पुरुष" परम सत्ता है। अद्वैत परंपरा "अक्षर" को निर्गुण ब्रह्म मानती है, जबकि वैष्णव परंपराएँ इसे स्वयं भगवान कृष्ण या विष्णु के रूप में पढ़ती हैं।