नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया ।शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा ॥
nāhaṃ vedairna tapasā na dānena na cejyayā |śakya evaṃvidho draṣṭuṃ dṛṣṭavānasi māṃ yathā ||
जिस रूप में तुमने मुझे अभी देखा है, उस रूप में मुझे न वेदों के अध्ययन से, न तप से, न दान से और न यज्ञ-पूजन से देखा जा सकता है।
व्याख्या
अर्जुन को विश्वरूप दिखाने के बाद कृष्ण कहते हैं कि वेदाध्ययन, तप, दान और यज्ञ जैसे सामान्य धार्मिक साधन अपने बल पर यह दर्शन नहीं करा सकते। अगला श्लोक बताता है कि इसका उपाय अनन्य भक्ति है।