सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तंहे कृष्ण हे यादव हे सखेति ।अजानता महिमानं तवेदंमया प्रमादात्प्रणयेन वापि ॥
sakheti matvā prasabhaṃ yaduktaṃhe kṛṣṇa he yādava he sakheti |ajānatā mahimānaṃ tavedaṃmayā pramādātpraṇayena vāpi ||
आपको अपना मित्र समझकर और आपकी इस महिमा को न जानते हुए, असावधानी से या स्नेहवश भी, मैंने ढिठाई से जो कुछ कह दिया — "हे कृष्ण! हे यादव! हे सखा!"…
व्याख्या
अर्जुन ने अभी कृष्ण का विराट रूप देखा है और वह काँप उठा है। अब उसे पछतावा है कि वह कृष्ण को अब तक सहज, मित्रवत ढंग से पुकारता रहा। वह इसका कारण असावधानी (प्रमाद) या आत्मीयता का स्नेह (प्रणय) बताता है, क्योंकि वह कृष्ण की सच्ची महिमा नहीं जानता था। यह वाक्य अगले श्लोक में जारी रहता है, जहाँ वह क्षमा माँगता है।