नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्तेनमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व ।अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वंसर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः ॥
namaḥ purastādatha pṛṣṭhatastenamo'stu te sarvata eva sarva |anantavīryāmitavikramastvaṃsarvaṃ samāpnoṣi tato'si sarvaḥ ||
आपको सामने से नमस्कार, और पीछे से भी नमस्कार; हे सर्वरूप, सब ओर से ही आपको नमस्कार है। आपका बल अनन्त है और पराक्रम अपरिमित है। आप सब कुछ में व्याप्त हैं, इसीलिए आप ही सब कुछ हैं।
व्याख्या
विश्वरूप के दर्शन से अभिभूत अर्जुन कृष्ण की स्तुति करता रहता है। वह हर दिशा में झुककर नमन करता है, क्योंकि ईश्वर सब ओर उपस्थित है। वह कहता है कि कृष्ण का बल (वीर्य) और पराक्रम (विक्रम) असीम हैं, और वे सब में व्याप्त हैं, इसलिए वे ही सब कुछ हैं।