नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णंव्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् ।दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्माधृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो ॥
nabhaḥspṛśaṃ dīptamanekavarṇaṃvyāttānanaṃ dīptaviśālanetram |dṛṣṭvā hi tvāṃ pravyathitāntarātmādhṛtiṃ na vindāmi śamaṃ ca viṣṇo ||
आकाश को छूते हुए, दहकते हुए, अनेक रंगों वाले, खुले हुए मुखों और चमकती विशाल आँखों वाले आपको देखकर मेरा अंतर्मन अत्यंत व्याकुल हो उठा है; हे विष्णु, मैं न धैर्य पा रहा हूँ, न शांति।
व्याख्या
अर्जुन ने कृष्ण से उनका विश्वरूप दिखाने को कहा था, और अब वह उसे देखकर घबरा गया है। वह ऐसे रूप का वर्णन करता है जो आकाश तक फैला है, तेज से दहक रहा है और जिसके मुख खुले तथा नेत्र विशाल और चमकीले हैं। इसे देखकर उसका धैर्य (धृति) और शांति (शम) दोनों छिन गए हैं, और वह कृष्ण को सर्वव्यापी विष्णु कहकर पुकारता है।