द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं चकर्णं तथाऽन्यानपि योधवीरान् ।मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठायुध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान् ॥
droṇaṃ ca bhīṣmaṃ ca jayadrathaṃ cakarṇaṃ tathā'nyānapi yodhavīrān |mayā hatāṃstvaṃ jahi mā vyathiṣṭhāyudhyasva jetāsi raṇe sapatnān ||
द्रोण, भीष्म, जयद्रथ, कर्ण और अन्य वीर योद्धा भी — ये सब मेरे द्वारा पहले ही मारे जा चुके हैं। तुम इन्हें मारो। व्याकुल मत हो। युद्ध करो! रण में तुम अपने शत्रुओं को अवश्य जीतोगे।
व्याख्या
काल के रूप में अपना विश्वरूप दिखाने के बाद कृष्ण अर्जुन को युद्ध के लिए प्रेरित करते हुए कहते हैं कि ये महान योद्धा उनके द्वारा पहले ही मारे जा चुके हैं। इसलिए अर्जुन को बिना भय और व्यथा के अपना कार्य करना है। टीकाकार इसे कहीं ईश्वर की इच्छा की प्रधानता के रूप में, तो कहीं योद्धा के धर्म और निमित्त बनकर कर्म करने के रूप में पढ़ते हैं।