dvāvimau puruṣau loke kṣaraścākṣara eva ca |kṣaraḥ sarvāṇi bhūtāni kūṭastho'kṣara ucyate ||
इस लोक में दो प्रकार के पुरुष हैं – क्षर और अक्षर। सभी प्राणी क्षर हैं, और जो कूटस्थ, यानी सदा एकरस और अचल भाव से स्थित है, वह अक्षर कहलाता है।
व्याख्या
श्रीकृष्ण परम सत्ता को समझाने से पहले यहाँ "पुरुष" के दो रूप बताते हैं। क्षर वह है जो बदलता और नष्ट होता है, यानी सब प्राणी; अक्षर वह है जो निहाई की तरह कूटस्थ, अपरिवर्तनशील रहता है। अक्षर के अर्थ पर व्याख्याकार भिन्न हैं: कुछ इसे मुक्त आत्मा या चेतन तत्त्व मानते हैं, कुछ प्रकृति का अपरिवर्तनशील मूल या माया का बीज।