यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् ।स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ॥
yo māmevamasammūḍho jānāti puruṣottamam |sa sarvavidbhajati māṃ sarvabhāvena bhārata ||
हे भारत! जो मोह से मुक्त होकर मुझे इस प्रकार पुरुषोत्तम के रूप में जानता है, वह सब कुछ जानने वाला है और पूरे भाव से मेरी भक्ति करता है।
व्याख्या
कृष्ण ने अभी कहा कि वे क्षर और अक्षर दोनों से परे हैं, इसलिए पुरुषोत्तम कहलाते हैं। यहाँ वे कहते हैं कि जो इसे बिना भ्रम (असम्मूढ) के जान लेता है, वह सर्वज्ञ है और पूर्ण भाव (सर्वभाव) से उनकी भक्ति करता है। वैष्णव परंपराएँ इस जानने को मुख्यतः भक्तिपूर्ण ज्ञान मानती हैं, जबकि अद्वैत परंपरा इसे एक परम सत्य का साक्षात्कार मानती है।