जीवों के इस संसार में जीव बना हुआ सनातन अंश मेरा ही है। वह प्रकृति में स्थित पाँच इन्द्रियों और छठे मन को अपनी ओर खींचता है।
व्याख्या
कृष्ण ने अभी अपने परम धाम का वर्णन किया, जहाँ से कोई लौटता नहीं। अब वे बताते हैं कि देहधारी जीव वास्तव में कौन है: वह उनका ही सनातन अंश है, जो प्रकृति में स्थित मन और पाँच इंद्रियों को अपनी ओर खींचता है। 'अंश' शब्द पर परंपराओं में भेद है: विशिष्टाद्वैत और द्वैत जैसी भक्ति-परंपराएँ इसे ईश्वर का वास्तविक, नित्य अंश मानती हैं, जबकि अद्वैत इसे एक ही आत्मा के अनेक रूपों में दिखने का लाक्षणिक कथन मानता है।