न रूपमस्येह तथोपलभ्यतेनान्तो न चादिर्न च संप्रतिष्ठा ।अश्वत्थमेनं सुविरूढमूलमसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा ॥
na rūpamasyeha tathopalabhyatenānto na cādirna ca saṃpratiṣṭhā |aśvatthamenaṃ suvirūḍhamūlamasaṅgaśastreṇa dṛḍhena chittvā ||
यहाँ इसका रूप वैसा दिखाई नहीं देता, न इसका अंत, न आदि और न ही इसका आधार। इस गहरी जड़ों वाले अश्वत्थ वृक्ष को अनासक्ति के दृढ़ शस्त्र से काटकर…
व्याख्या
कृष्ण जन्म-मरण के चक्र (संसार) को उल्टे अश्वत्थ (पीपल) वृक्ष के रूप में समझाना जारी रखते हैं। हम स्वयं इसके भीतर उलझे हैं, इसलिए इसका पूरा रूप, आदि, अंत या आधार सामान्य दृष्टि से दिखाई नहीं देता। इसे काटने का उपाय वे अनासक्ति (असङ्ग) रूपी दृढ़ शस्त्र बताते हैं, और वाक्य अगले श्लोक में पूरा होता है। अद्वैत परंपरा इस वृक्ष को अंततः मायिक मानती है, जबकि भक्ति-परंपराएँ इसे वास्तविक पर बाँधने वाला मानती हैं।