यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः ।अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥
yasmātkṣaramatīto'hamakṣarādapi cottamaḥ |ato'smi loke vede ca prathitaḥ puruṣottamaḥ ||
क्योंकि मैं नश्वर से परे हूँ और अविनाशी से भी श्रेष्ठ हूँ, इसलिए लोक में और वेद में मैं पुरुषोत्तम के नाम से प्रसिद्ध हूँ।
व्याख्या
कृष्ण यहाँ दो प्रकार के पुरुष की चर्चा पूरी करते हैं: क्षर (नश्वर, यानी परिवर्तनशील सभी प्राणी) और अक्षर (अविनाशी, जिसे प्रायः कूटस्थ आत्मा या मुक्त अवस्था माना जाता है)। वे कहते हैं कि वे दोनों से परे हैं, इसीलिए पुरुषोत्तम कहलाते हैं। व्याख्याओं में भेद है: अद्वैत परंपरा इसे अक्षर से भी परे एक परम सत्ता के रूप में देखती है, जबकि वैष्णव भक्ति परंपराएँ इसे जीव और प्रकृति दोनों से श्रेष्ठ साकार भगवान मानती हैं।