तब उस पद की खोज करनी चाहिए, जहाँ पहुँचकर लोग फिर लौटकर नहीं आते, यह भाव रखते हुए कि “मैं उसी आदि पुरुष की शरण लेता हूँ, जिससे यह पुरातन प्रवृत्ति-धारा फैली है।”
व्याख्या
कृष्ण ने अभी संसार को गहरी जड़ों वाले वृक्ष के रूप में बताया, जिसे अनासक्ति (असङ्ग) के दृढ़ शस्त्र से काटना है। इसके बाद साधक को उस परम पद की खोज करनी है, जहाँ से पुनर्जन्म में वापसी नहीं होती। “मैं शरण लेता हूँ” (प्रपद्ये) को कुछ टीकाकार साधक का अपना संकल्प मानते हैं, तो कुछ उस आदि पुरुष के प्रति समर्पण का उपदेश, जिससे सृष्टि की यह पुरानी प्रवृत्ति चली है।