मैं वैश्वानर, यानी जठराग्नि, बनकर प्राणियों के शरीर में रहता हूँ। प्राण और अपान वायु के साथ मिलकर मैं चारों प्रकार के अन्न को पचाता हूँ।
व्याख्या
पिछले श्लोक में पृथ्वी और चंद्रमा द्वारा पोषण की बात कहने के बाद कृष्ण यहाँ बताते हैं कि वे हर प्राणी के भीतर पाचन की अग्नि (वैश्वानर) के रूप में स्थित हैं। प्राण और अपान (भीतर आने और बाहर जाने वाली श्वास) के साथ मिलकर वह चार प्रकार के भोजन को पचाती है, जिन्हें परंपरा में चबाकर खाया जाने वाला, चूसा जाने वाला, चाटा जाने वाला और पिया जाने वाला माना गया है। भाव यह है कि शरीर की सामान्य जीवन-क्रियाओं में भी ईश्वर की शक्ति काम करती है।