प्रयत्न करने वाले योगी इस आत्मा को अपने भीतर स्थित देखते हैं। पर जिन्होंने अपने अंतःकरण को शुद्ध नहीं किया और जिनमें समझ नहीं है, वे प्रयत्न करके भी इसे नहीं देख पाते।
व्याख्या
पिछले श्लोक में कृष्ण ने कहा कि केवल ज्ञान-चक्षु वाले ही आत्मा को देह छोड़ते, रहते या भोगते समय देख पाते हैं। यहाँ वे जोड़ते हैं कि केवल प्रयत्न काफ़ी नहीं है; योगी (साधना में अनुशासित व्यक्ति) का अंतःकरण भी शुद्ध और तैयार होना चाहिए, क्योंकि अकृतात्मा का अर्थ है जिसका मन संस्कारित नहीं हुआ। आचार्य इस शुद्धि में अलग-अलग बातों पर बल देते हैं, जैसे नैतिक अनुशासन, भक्ति या ज्ञान, पर इसकी आवश्यकता सभी मानते हैं।