श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च ।अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते ॥
śrotraṃ cakṣuḥ sparśanaṃ ca rasanaṃ ghrāṇameva ca |adhiṣṭhāya manaścāyaṃ viṣayānupasevate ||
कान, आँख, त्वचा, जीभ और नाक तथा मन का आश्रय लेकर यह जीव विषयों का भोग करता है।
व्याख्या
पिछले श्लोक में कृष्ण ने बताया कि देहधारी जीव इंद्रियों को साथ लेकर एक शरीर से दूसरे में जाता है, जैसे हवा गंध को ले जाती है। यहाँ वे कहते हैं कि वही पाँच इंद्रियों और मन के सहारे शब्द, रूप, रस जैसे विषयों का अनुभव करता है। व्याख्याकारों में भिन्नता है: कुछ आत्मा को केवल साक्षी मानकर भोग को आभासी समझते हैं, तो कुछ इंद्रियों के माध्यम से उसे वास्तविक भोक्ता मानते हैं।