न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः ।यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥
na tadbhāsayate sūryo na śaśāṅko na pāvakaḥ |yadgatvā na nivartante taddhāma paramaṃ mama ||
वहाँ न सूर्य प्रकाश पहुँचाता है, न चंद्रमा, न अग्नि। जहाँ पहुँचकर लोग लौटकर नहीं आते, वही मेरा परम धाम है।
व्याख्या
पिछले श्लोक में कृष्ण ने उन विवेकी लोगों की बात की जो अविनाशी पद पाते हैं। यहाँ वे बताते हैं कि उस पद को, यानी उनके अपने परम धाम को, सूर्य, चंद्रमा या अग्नि प्रकाशित नहीं करते; टीकाकार इसे स्वयं-प्रकाश मानते हैं। वहाँ पहुँचने पर जन्म-मरण का चक्र (संसार) समाप्त हो जाता है। परंपराएँ इस धाम को कहीं कृष्ण का निजी लोक और कहीं निराकार आत्मा या ब्रह्म मानती हैं।