किन्तु इनसे भिन्न एक उत्तम पुरुष है, जिसे परमात्मा कहा गया है। वह अविनाशी ईश्वर तीनों लोकों में प्रवेश करके उनका भरण-पोषण करता है।
व्याख्या
पिछले श्लोक में कृष्ण ने दो पुरुष बताए: क्षर, यानी नाशवान सभी प्राणी, और अक्षर, यानी कूटस्थ अपरिवर्तनशील तत्त्व। अब वे इन दोनों से परे तीसरे, सर्वोच्च पुरुष परमात्मा की बात करते हैं। वही अविनाशी ईश्वर तीनों लोकों में व्याप्त होकर उन्हें धारण करता है। परमात्मा और जीवात्मा के संबंध को अद्वैत परंपराएँ अंततः एक मानती हैं, जबकि द्वैत और विशिष्टाद्वैत जैसी भक्ति-परंपराएँ उनमें वास्तविक भेद देखती हैं।