ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् ।छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥
ūrdhvamūlamadhaḥśākhamaśvatthaṃ prāhuravyayam |chandāṃsi yasya parṇāni yastaṃ veda sa vedavit ||
जिसकी जड़ें ऊपर और शाखाएँ नीचे हैं, उस अश्वत्थ वृक्ष को अविनाशी कहा गया है; वेद के मंत्र उसके पत्ते हैं। जो इस वृक्ष को जान लेता है, वही वेद को जानने वाला है।
व्याख्या
कृष्ण यहाँ अश्वत्थ (पीपल) वृक्ष के रूपक से नई शिक्षा शुरू करते हैं, जो जन्म-मृत्यु के चक्र वाले संसार का प्रतीक है। इसकी जड़ें ऊपर, परम स्रोत में हैं और शाखाएँ नीचे फैली हैं। वेद के मंत्र इसके पत्ते हैं, यानी वे इसी वृक्ष का पोषण करते हैं और इसी से जुड़े हैं। 'अव्यय' (अविनाशी) को टीकाकार इस अर्थ में लेते हैं कि संसार का यह प्रवाह अनादि काल से चलता आ रहा है, पर आगे के श्लोकों के अनुसार इसे वैराग्य से काटा जा सकता है, इसलिए यह स्थायित्व केवल प्रवाह का है।