जब वह शरीर छोड़कर जाता है, जब वह शरीर में टिका रहता है, या जब वह गुणों से युक्त होकर भोग करता है, तब मूढ़ लोग उसे नहीं देख पाते; ज्ञान की आँख वाले ही उसे देखते हैं।
व्याख्या
कृष्ण यहाँ देहधारी जीव की बात कर रहे हैं, जो इंद्रियों और मन का सहारा लेकर संसार का अनुभव करता है। चाहे वह देह से निकल रहा हो, देह में स्थित हो, या गुणों (प्रकृति के तीन घटक: सत्त्व, रजस् और तमस्) से जुड़कर भोग रहा हो, मोह में पड़े लोग उसे नहीं पहचान पाते। केवल जिनकी ज्ञान-दृष्टि (ज्ञानचक्षु) खुल चुकी है, वे उसे देखते हैं। टीकाकार इस पर भिन्न मत रखते हैं कि यह केवल व्यक्तिगत आत्मा है या परमात्मा से अभिन्न आत्मा, पर सभी मानते हैं कि यह दर्शन ज्ञान से होता है, इंद्रियों से नहीं।