nirmānamohā jitasaṅgadoṣāadhyātmanityā vinivṛttakāmāḥ |dvandvairvimuktāḥ sukhaduḥkhasaṃjñairgacchantyamūḍhāḥ padamavyayaṃ tat ||
जो मान और मोह से मुक्त हैं, जिन्होंने आसक्ति के दोष को जीत लिया है, जो सदा आत्मा में स्थित रहते हैं, जिनकी कामनाएँ निवृत्त हो चुकी हैं और जो सुख-दुःख नामक द्वंद्वों से छूट गए हैं, ऐसे विवेकी लोग उस अविनाशी पद को प्राप्त करते हैं।
व्याख्या
कृष्ण ने अभी कहा कि जहाँ से लौटना नहीं होता, उस पद की खोज करनी चाहिए; अब वे बताते हैं कि उसे कौन पाता है। ऐसे लोग अभिमान, मोह, आसक्ति (सङ्ग) और कामना से मुक्त होते हैं और सुख-दुःख के खिंचाव से छूटकर अध्यात्म, यानी आत्मा में, स्थिर रहते हैं। उस अविनाशी पद को अद्वैत परंपरा आत्मा का अपना स्वरूप मानती है, जबकि भक्ति परंपराएँ उसे कृष्ण का परम धाम मानती हैं।