मैं पृथ्वी में प्रवेश करके अपनी शक्ति से सब प्राणियों को धारण करता हूँ, और रस-स्वरूप सोम बनकर सभी औषधियों (वनस्पतियों) का पोषण करता हूँ।
व्याख्या
सूर्य, चंद्र और अग्नि के तेज की बात के बाद कृष्ण यहाँ बताते हैं कि उनकी शक्ति सारे जगत में व्याप्त है। वे पृथ्वी में प्रवेश कर प्राणियों को धारण करते हैं और रस-स्वरूप सोम (चंद्रमा, जिसे जीवनदायी रस का स्रोत माना गया है) बनकर वनस्पतियों को पुष्ट करते हैं। परंपराएँ इसे अलग ढंग से समझती हैं: कुछ इसे प्रकृति में ईश्वर की वास्तविक उपस्थिति मानती हैं, तो कुछ इसे ईश्वर के सबका आधार होने का काव्यात्मक संकेत।