ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाऽहममृतस्याव्ययस्य च ।शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च ॥
brahmaṇo hi pratiṣṭhā'hamamṛtasyāvyayasya ca |śāśvatasya ca dharmasya sukhasyaikāntikasya ca ||
क्योंकि मैं ही ब्रह्म का आधार हूँ — उस अमृत और अविनाशी का, शाश्वत धर्म का और अखंड, निर्मल सुख का भी।
व्याख्या
तीन गुणों (प्रकृति के गुणों) वाले अध्याय के अंत में कृष्ण बताते हैं कि उनकी भक्ति मनुष्य को गुणों से पार क्यों ले जाती है। वे स्वयं को ब्रह्म, अमृतत्व, शाश्वत धर्म (जीवन को धारण करने वाली व्यवस्था) और पूर्ण सुख की प्रतिष्ठा, यानी आधार, कहते हैं। "ब्रह्म" पर परंपराएँ भिन्न हैं: अद्वैत इसे निर्गुण परम तत्त्व मानकर कृष्ण के स्वरूप में स्थित देखता है, जबकि भक्ति परंपराएँ कृष्ण को परम स्रोत मानती हैं, जिनका एक पक्ष ब्रह्म है।