उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते ।गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते ॥
udāsīnavadāsīno guṇairyo na vicālyate |guṇā vartanta ityeva yo'vatiṣṭhati neṅgate ||
जो उदासीन की तरह बैठा रहता है और गुणों से विचलित नहीं होता, तथा "गुण ही अपना कार्य कर रहे हैं" ऐसा जानकर अपने में स्थिर रहता है और डगमगाता नहीं…
व्याख्या
अर्जुन ने पूछा था कि तीनों गुणों (प्रकृति के गुण: सत्त्व, रजस् और तमस्) से परे गया व्यक्ति कैसे रहता है। कृष्ण बताते हैं कि वह दर्शक की तरह निर्लिप्त दिखता है, क्योंकि वह देखता है कि कार्य गुण ही कर रहे हैं, इसलिए वह स्थिर रहता है। परंपराएँ इसे अलग ढंग से समझती हैं: कुछ इसे कर्तापन के भाव के बिना कर्म जारी रहना मानती हैं, कुछ कर्म से हट जाना। श्लोक स्वयं केवल भीतर की स्थिरता बताता है।