tatra sattvaṃ nirmalatvātprakāśakamanāmayam |sukhasaṅgena badhnāti jñānasaṅgena cānagha ||
उनमें सत्त्व निर्मल होने के कारण प्रकाश देने वाला और दोषरहित है। हे निष्पाप, वह सुख की आसक्ति और ज्ञान की आसक्ति के द्वारा बाँधता है।
व्याख्या
कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि प्रकृति के तीन गुण देह में रहने वाली आत्मा को कैसे बाँधते हैं। सत्त्व (शुद्धता और स्पष्टता का गुण) स्वच्छ काँच की तरह निर्मल है, इसलिए प्रकाश देता है और कष्ट से रहित (अनामय) है। फिर भी वह बाँधता है, क्योंकि मनुष्य उससे मिलने वाले सुख और ज्ञान में आसक्त (सङ्ग) हो जाता है। टीकाकार "ज्ञान" को साधारण समझ मानते हैं या ज्ञानी होने का सूक्ष्म अभिमान, इस पर उनमें भेद है, पर सभी इसे बंधन ही मानते हैं।