जब देखने वाला यह देख लेता है कि गुणों के सिवा कोई और कर्ता नहीं है, और गुणों से परे जो है उसे जान लेता है, तब वह मेरे स्वरूप को पा लेता है।
व्याख्या
पिछले श्लोक में कृष्ण ने बताया कि सत्त्व, रज और तमोगुण वाले लोग किस गति को जाते हैं। यहाँ वे कहते हैं कि सच्चा ज्ञान यह देखना है कि सारे कर्म गुण (प्रकृति के तीन धागे) ही करते हैं, और साक्षी आत्मा उनसे अलग है। ऐसा जानने वाला कृष्ण के भाव (मद्भाव) को पाता है। इस भाव का अर्थ परंपराओं में भिन्न है: अद्वैत इसे परम तत्त्व से एकता मानता है, जबकि भक्ति-परंपराएँ इसे भक्त बने रहते हुए भगवान के दिव्य स्वभाव में भागीदारी मानती हैं।