जो सुख और दुःख में समान रहता है, अपने आप में स्थित है, मिट्टी के ढेले, पत्थर और सोने को एक-सा देखता है, प्रिय और अप्रिय के प्रति तुल्य रहता है, धीर है, और अपनी निंदा तथा स्तुति में समभाव रखता है…
व्याख्या
अर्जुन ने पूछा था कि तीनों गुणों (प्रकृति के वे तत्त्व जो मन और कर्म को ढालते हैं) से परे गया व्यक्ति कैसा होता है। उसी के उत्तर में कृष्ण यहाँ उसके लक्षण बताते हैं: सुख-दुःख, प्रिय-अप्रिय और निंदा-स्तुति में संतुलन, और मिट्टी, पत्थर और सोने को एक-सा देखना। "स्वस्थ" का अर्थ "अपने स्वरूप में स्थित" या "अपने भीतर सहज" दोनों लिया जा सकता है; वाक्य अगले श्लोक तक चलता है।