मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः ।सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते ॥
mānāpamānayostulyastulyo mitrāripakṣayoḥ |sarvārambhaparityāgī guṇātītaḥ sa ucyate ||
जो मान और अपमान में एक-सा रहता है, मित्र और शत्रु दोनों पक्षों के प्रति समान रहता है, और सब उद्यमों का त्याग कर चुका है, वह गुणों से परे कहा जाता है।
व्याख्या
अर्जुन ने पूछा था कि तीनों गुणों (प्रकृति के तीन गुण: सत्त्व, रजस् और तमस्) से परे व्यक्ति के लक्षण क्या हैं; कृष्ण यहाँ उसी सूची को पूरा करते हैं। ऐसा व्यक्ति मान-अपमान और मित्र-शत्रु के बीच समभाव रखता है। "सर्वारम्भपरित्याग" को आम तौर पर स्वार्थ-प्रेरित योजनाओं और कर्तापन के भाव का त्याग माना जाता है, कर्म का पूरी तरह रुक जाना नहीं।