प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव ।न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति ॥
prakāśaṃ ca pravṛttiṃ ca mohameva ca pāṇḍava |na dveṣṭi sampravṛttāni na nivṛttāni kāṅkṣati ||
हे पाण्डव! जो प्रकाश, प्रवृत्ति और मोह — इनके उपस्थित होने पर इनसे द्वेष नहीं करता, और इनके हट जाने पर इनकी कामना नहीं करता…
व्याख्या
अर्जुन ने पूछा था कि गुणातीत व्यक्ति के लक्षण क्या हैं; कृष्ण उसी का उत्तर शुरू करते हैं। प्रकाश, प्रवृत्ति और मोह क्रमशः सत्त्व, रजस् और तमस् — इन तीन गुणों के फल माने जाते हैं। गुणातीत व्यक्ति इनके आने पर इनसे घृणा नहीं करता और इनके जाने पर इन्हें चाहता नहीं। परंपराएँ इसे जीवन्मुक्त की अवस्था का वर्णन भी मानती हैं और साधना का आदर्श भी; श्लोक स्वयं इसका निर्णय नहीं करता।