हे कौन्तेय, सभी योनियों में जो-जो रूप उत्पन्न होते हैं, उन सबकी योनि (गर्भ) महान ब्रह्म है, और बीज देने वाला पिता मैं हूँ।
व्याख्या
पिछले श्लोक की बात आगे बढ़ाते हुए कृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि हर प्राणी के जन्म के पीछे दो कारण हैं। यहाँ "महत् ब्रह्म" का अर्थ जगत की मूल प्रकृति है, जो सबको जन्म देने वाली माता के गर्भ जैसी है, और कृष्ण स्वयं बीज देने वाले पिता हैं। शंकर और रामानुज जैसी परंपराएँ इस "ब्रह्म" को प्रकृति के रूप में पढ़ती हैं, पर उसके परमेश्वर से संबंध को अलग-अलग ढंग से समझाती हैं।