अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च ।तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन ॥
aprakāśo'pravṛttiśca pramādo moha eva ca |tamasyetāni jāyante vivṛddhe kurunandana ||
हे कुरुनन्दन! जब तमोगुण बढ़ जाता है, तब समझ का अंधकार, निष्क्रियता, असावधानी और मोह उत्पन्न होते हैं।
व्याख्या
कृष्ण यहाँ बता रहे हैं कि प्रकृति के तीन गुण मनुष्य में कैसे प्रकट होते हैं। इस श्लोक में वे तमोगुण, यानी जड़ता और अंधकार के गुण, के लक्षण गिनाते हैं: समझ की मंदता (अप्रकाश), निष्क्रियता (अप्रवृत्ति), असावधानी (प्रमाद) और मोह। अर्जुन को यहाँ "कुरुनन्दन" कहकर पुकारा गया है।