इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः ।सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥
idaṃ jñānamupāśritya mama sādharmyamāgatāḥ |sarge'pi nopajāyante pralaye na vyathanti ca ||
इस ज्ञान का आश्रय लेकर जो लोग मेरे स्वरूप की समानता को प्राप्त हो गए हैं, वे सृष्टि के समय फिर जन्म नहीं लेते और प्रलय के समय व्याकुल भी नहीं होते।
व्याख्या
श्रीकृष्ण पिछले श्लोक में बताए गए परम ज्ञान की बात आगे बढ़ा रहे हैं, जिससे मुनि सिद्धि को प्राप्त हुए। वे कहते हैं कि जो इस ज्ञान की शरण लेते हैं, वे उनके स्वरूप की समानता (साधर्म्य) पाते हैं। ऐसे लोग सृष्टि के समय पुनर्जन्म के चक्र में नहीं आते और प्रलय में व्याकुल नहीं होते। परंपराओं में मतभेद है कि यह समानता स्वभाव की साम्यता है, जिसमें भेद बना रहता है, या भगवान से पूर्ण एकत्व।