मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते ।स गुणान्समतीत्यैतान् ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥
māṃ ca yo'vyabhicāreṇa bhaktiyogena sevate |sa guṇānsamatītyaitān brahmabhūyāya kalpate ||
और जो मेरी सेवा अटूट भक्तियोग से करता है, वह इन गुणों को पूरी तरह पार करके ब्रह्म होने के योग्य बन जाता है।
व्याख्या
अर्जुन ने पूछा था कि गुणों से परे कैसे जाया जाता है; पिछले श्लोकों में गुणातीत के लक्षण बताकर कृष्ण अब उसका उपाय बताते हैं। गुण प्रकृति के तीन स्वभाव हैं — सत्त्व, रजस् और तमस् — और भक्तियोग का अर्थ है प्रेमपूर्ण भक्ति का मार्ग। "ब्रह्म होने" को अद्वैत परंपरा ब्रह्म के साथ एकत्व मानती है, जबकि भक्ति परंपराएँ इसे ब्रह्म-तुल्य अवस्था मानती हैं, जिसमें भक्त और भगवान का भेद बना रहता है।