yadā sattve pravṛddhe tu pralayaṃ yāti dehabhṛt |tadottamavidāṃ lokānamalānpratipadyate ||
जब सत्त्वगुण के बढ़े रहने की अवस्था में देहधारी जीव की मृत्यु होती है, तब वह उत्तम तत्त्व को जानने वालों के निर्मल लोकों को प्राप्त करता है।
व्याख्या
कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि प्रकृति के तीन गुणों में से जो गुण प्रबल हो, उसके अनुसार मृत्यु के बाद क्या गति होती है। यहाँ सत्त्वगुण (स्पष्टता और शुद्धता) प्रबल हो, तो जीव ज्ञानियों के निर्मल लोकों को पाता है। टीकाकार इन "लोकों" को कहीं स्वर्ग जैसी अवस्थाएँ मानते हैं, तो कहीं मोक्ष की राह में शुद्ध चेतना की अवस्था।