जिसने अपने मन को वश में कर लिया है, वह देहधारी सब कर्मों को मन से त्यागकर नौ द्वारों वाले नगर में सुखपूर्वक टिका रहता है; न वह स्वयं कुछ करता है, न किसी से करवाता है।
व्याख्या
कृष्ण उस साधक का वर्णन जारी रखते हैं जो फल की आसक्ति छोड़कर संयमित रहता है। "नौ द्वारों वाला नगर" शरीर है, जिसमें नौ छिद्र माने गए हैं। ऐसा व्यक्ति भीतर से कर्तापन (कर्तृत्व) छोड़ देता है, इसलिए शरीर के कार्य करते रहने पर भी वह शांत रहता है। इस आंतरिक संन्यास को कुछ परंपराएँ बाहरी कर्म के साथ संभव मानती हैं और कुछ औपचारिक संन्यास की ओर संकेत मानती हैं।