nādatte kasyacitpāpaṃ na caiva sukṛtaṃ vibhuḥ |ajñānenāvṛtaṃ jñānaṃ tena muhyanti jantavaḥ ||
सर्वव्यापी प्रभु न किसी के पाप को ग्रहण करता है और न किसी के पुण्य को। ज्ञान अज्ञान से ढका हुआ है, इसी कारण प्राणी मोह में पड़ जाते हैं।
व्याख्या
पिछले श्लोक में कृष्ण ने कहा कि प्रभु लोगों के कर्तापन और कर्मों की रचना नहीं करता। यहाँ वे कहते हैं कि सर्वव्यापी (विभु) किसी का पाप या पुण्य (सुकृत) अपने ऊपर नहीं लेता। अज्ञान ज्ञान को ढक लेता है, इसलिए प्राणी भ्रमित होते हैं। कुछ व्याख्याकार "विभु" को परमेश्वर मानते हैं, तो कुछ उसे आत्मा, जो कर्म से अछूती रहती है।