ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते ।आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः ॥
ye hi saṃsparśajā bhogā duḥkhayonaya eva te |ādyantavantaḥ kaunteya na teṣu ramate budhaḥ ||
जो भोग इंद्रियों और विषयों के संपर्क से उत्पन्न होते हैं, वे वास्तव में दुःख के ही स्रोत हैं। हे कुंतीपुत्र, उनका आदि भी है और अंत भी; इसलिए समझदार मनुष्य उनमें रमता नहीं।
व्याख्या
कृष्ण अर्जुन को बाहरी सुख और भीतरी आनंद का अंतर समझा रहे हैं। इंद्रियों और विषयों के संपर्क (संस्पर्श) से मिलने वाले भोग क्षणिक हैं, और उन्हें पकड़े रखने की चाह दुःख लाती है, इसलिए विवेकी (बुध) उनमें नहीं रमते। अद्वैत परंपरा आत्मा के आनंद को ही स्थायी मानने पर बल देती है, जबकि भक्ति परंपरा इंद्रियों को ईश्वर की ओर मोड़ने पर बल देती है।