शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात् ।कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः ॥
śaknotīhaiva yaḥ soḍhuṃ prākśarīravimokṣaṇāt |kāmakrodhodbhavaṃ vegaṃ sa yuktaḥ sa sukhī naraḥ ||
जो मनुष्य यहीं, इस शरीर के छूटने से पहले, काम और क्रोध से उठने वाले वेग को सह लेने में समर्थ है, वही युक्त है और वही सुखी है।
व्याख्या
पिछले श्लोक में कृष्ण ने कहा कि इंद्रियों के संपर्क से जन्मे भोग आदि-अंत वाले हैं और दुःख के ही कारण बनते हैं। यहाँ वे बताते हैं कि सच्चा सुखी वह है जो इसी जीवन में काम और क्रोध के वेग को बिना बहे सह लेता है। "युक्त" का अर्थ है योग में स्थिर, यानी आंतरिक संतुलन और एकत्व की साधना में दृढ़।