जिसका मन बाहरी विषयों के स्पर्श में आसक्त नहीं होता, वह अपने भीतर जो सुख है उसे पा लेता है। ब्रह्म के साथ योग में जुड़े मन वाला वह व्यक्ति कभी न घटने वाले सुख का अनुभव करता है।
व्याख्या
कृष्ण उस स्थिर बुद्धि वाले व्यक्ति का वर्णन जारी रखते हैं जो ब्रह्म (परम सत्य) में स्थित है। बाहरी इंद्रिय-स्पर्शों में अनासक्त (असक्त) रहने से वह अपनी आत्मा के भीतर स्थायी आनंद पाता है। इस सुख को अक्षय कहा गया है, क्योंकि यह बाहरी वस्तुओं पर निर्भर सुखों जैसा नहीं है।