न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः ।न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते ॥
na kartṛtvaṃ na karmāṇi lokasya sṛjati prabhuḥ |na karmaphalasaṃyogaṃ svabhāvastu pravartate ||
प्रभु लोगों के लिए न कर्तापन रचता है, न कर्मों को, और न कर्म तथा उसके फल के संयोग को। यह तो स्वभाव ही है जो अपना काम करता रहता है।
व्याख्या
कृष्ण उस व्यक्ति का वर्णन आगे बढ़ा रहे हैं जिसने कर्तापन का भाव छोड़ दिया है। प्रभु हमारे भीतर "मैं कर्ता हूँ" का भाव (कर्तृत्व), विशेष कर्म, या कर्म और फल का संबंध नहीं रचते; ये सब स्वभाव, यानी प्रकृति और उसके गुणों की क्रिया से उठते हैं। कुछ व्याख्याकार "प्रभु" को देह की स्वामिनी आत्मा मानते हैं, जो स्वयं कुछ नहीं करती, तो कुछ उसे ईश्वर मानते हैं, जो जीवों के कर्मों के लिए उत्तरदायी नहीं है। दोनों इस पर सहमत हैं कि कर्तापन ऊपर से थोपा हुआ नहीं है।