बाहरी विषयों के स्पर्शों को बाहर ही छोड़कर, दृष्टि को दोनों भौंहों के बीच टिकाकर, और नासिका के भीतर चलने वाले प्राण और अपान को सम करके…
व्याख्या
कृष्ण मोक्ष चाहने वालों के लिए ध्यान की साधना बता रहे हैं, और यह वाक्य अगले श्लोक तक चलता है। वे बाहरी विषयों के स्पर्श से मन को हटाने, दृष्टि को भौंहों के बीच टिकाने, और भीतर आने वाली श्वास (प्राण) तथा बाहर जाने वाली श्वास (अपान) को सम करने की बात करते हैं। कुछ परंपराएँ दृष्टि को शाब्दिक अभ्यास मानती हैं, जबकि अन्य इसे भीतर एकाग्रता का संकेत समझती हैं।