परन्तु हे महाबाहो, योग के बिना संन्यास को पाना कठिन और दुःखदायी है। योग से युक्त मुनि शीघ्र ही ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है।
व्याख्या
अर्जुन ने पूछा था कि कर्मों का त्याग (संन्यास) श्रेष्ठ है या कर्मयोग। इसी प्रश्न का उत्तर देते हुए कृष्ण कहते हैं कि योग, यानी फल की आसक्ति छोड़कर समभाव से किया गया कर्म और मन का अनुशासन, अपनाए बिना संन्यास साधना कठिन है। जो मुनि (मननशील साधक) योग से युक्त होता है, वह शीघ्र ही ब्रह्म (परम सत्य) तक पहुँचता है। शंकराचार्य की परंपरा इस योग को मन को शुद्ध करने वाला साधन मानकर संन्यास और ज्ञान की ओर ले जाने वाला पढ़ती है, जबकि रामानुज जैसी परंपराएँ कर्मयोग को ही आत्मा की अनुभूति का सीधा मार्ग समझती हैं।