यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः ।विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः ॥
yatendriyamanobuddhirmunirmokṣaparāyaṇaḥ |vigatecchābhayakrodho yaḥ sadā mukta eva saḥ ||
जिसने इन्द्रियों, मन और बुद्धि को वश में कर लिया है, जो मोक्ष को ही परम लक्ष्य मानता है और जो इच्छा, भय तथा क्रोध से मुक्त हो चुका है, वह मुनि सदा मुक्त ही है।
व्याख्या
यह श्लोक पिछले श्लोक में शुरू हुआ वाक्य पूरा करता है, जहाँ कृष्ण ने ध्यान की विधि बताई थी। ऐसे ध्यान में लगा मुनि, जिसकी इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि संयमित हैं, जिसका लक्ष्य मोक्ष है और जो इच्छा, भय तथा क्रोध से परे है, सदा मुक्त ही है। ऐसे व्यक्ति को इसी जीवन में मुक्त (जीवन्मुक्त) माना गया है।