इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः ।निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः ॥
ihaiva tairjitaḥ sargo yeṣāṃ sāmye sthitaṃ manaḥ |nirdoṣaṃ hi samaṃ brahma tasmādbrahmaṇi te sthitāḥ ||
जिनका मन समभाव में टिका है, उन्होंने इसी जीवन में संसार को जीत लिया है। क्योंकि ब्रह्म निर्दोष और सबमें सम है, इसलिए वे ब्रह्म में ही स्थित हैं।
व्याख्या
पिछले श्लोक में ज्ञानी सबको समान दृष्टि से देखते हैं; कृष्ण उसी बात को आगे बढ़ाते हैं। वे कहते हैं कि समता (साम्य) में स्थिर मन वाले लोग इसी जीवन में सर्ग यानी जन्म-मरण के चक्र पर विजय पा लेते हैं। कारण यह है कि परम सत्य ब्रह्म निर्दोष और सबमें समान है, इसलिए समदर्शी व्यक्ति ब्रह्म में ही स्थित रहता है। कुछ व्याख्याकार 'सर्ग' को जन्म-मरण का संसार मानते हैं, कुछ सांसारिक द्वंद्वों का बंधन; श्लोक दोनों अर्थों को सहारा देता है।