ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति ।निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते ॥
jñeyaḥ sa nityasaṃnyāsī yo na dveṣṭi na kāṅkṣati |nirdvandvo hi mahābāho sukhaṃ bandhātpramucyate ||
जो न किसी से द्वेष करता है और न किसी चीज़ की कामना करता है, उसे सदा का संन्यासी जानो। हे महाबाहो, द्वंद्वों से मुक्त ऐसा मनुष्य सहज ही बंधन से छूट जाता है।
व्याख्या
अर्जुन ने पूछा था कि संन्यास श्रेष्ठ है या कर्म। कृष्ण कहते हैं कि सच्चा संन्यास भीतर की अवस्था है: जो द्वेष और कामना से रहित है और सुख-दुःख जैसे द्वंद्वों से अप्रभावित रहता है, वह कर्म करते हुए भी संन्यासी है। ऐसा व्यक्ति बिना कठिनाई के कर्म और पुनर्जन्म के बंधन से मुक्त हो जाता है।